I-PAC case Supreme Court – सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अभियान के दौरान न्यायिक अधिकारियों के कथित घेराव और उन्हें बंधक बनाए जाने की घटना पर कड़ी नाराजगी जताई है। I-PAC case Supreme Court – अदालत ने इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया।
I-PAC case Supreme Court –न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाए जाने पर सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि SIR अभियान में तैनात न्यायिक अधिकारियों के साथ इस तरह का व्यवहार बेहद गंभीर और अस्वीकार्य है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी परिस्थिति में न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा और स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया जा सकता।

“जमीनी हकीकत को नजरअंदाज नहीं कर सकते” – Supreme Court
जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने पश्चिम बंगाल की मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक स्थिति को “असाधारण” बताया। अदालत ने कहा कि भले ही वकील कानूनी सिद्धांतों पर बहस करें, लेकिन न्यायालय राज्य में बन रही वास्तविक परिस्थितियों से आंखें नहीं मूंद सकता।
अदालत ने टिप्पणी की कि न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाए जाने जैसी घटनाएं बेहद चिंताजनक हैं और इन पर गंभीरता से विचार जरूरी है। मामले की अगली सुनवाई निर्धारित की गई है।
Mamata Banerjee – ED जांच में कथित दखल पर भी उठे सवाल
I-PAC मामले में कोलकाता में चल रही ED जांच को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई। अदालत ने सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee की कथित भूमिका पर सवाल उठाए।
कोर्ट ने कहा कि किसी जांच एजेंसी के काम में इस तरह का हस्तक्षेप संवैधानिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।
“ऐसे कृत्य लोकतंत्र को खतरे में डालते हैं” – अदालत
सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी राज्य की मुख्यमंत्री द्वारा जांच के दौरान एजेंसी के दफ्तर में प्रवेश करना और हस्तक्षेप करना लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा करता है।
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अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह मामला केवल राज्य और केंद्र के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि यह व्यक्तिगत आचरण का मामला है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों को प्रभावित करता है।
पश्चिम बंगाल की स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त नजर
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियां पश्चिम बंगाल की मौजूदा स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। आने वाली सुनवाई में इस मामले पर और स्पष्टता आने की उम्मीद है, जिससे जवाबदेही तय होने के साथ-साथ लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती भी सुनिश्चित हो सकेगी।
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